सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये,
Sunday, 21 December 2014
अभी जिँदगी का रुख बहुत खिलाफ है मेरे..... दिया जिधर भी जलाऊं, हवा उधर से चलने लगती है. .
http://bansilal.tumblr.com/post/105781285933
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Comments (Atom)