सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये,
Sunday, 21 December 2014
अभी जिँदगी का रुख बहुत खिलाफ है मेरे..... दिया जिधर भी जलाऊं, हवा उधर से चलने लगती है. .
http://bansilal.tumblr.com/post/105781285933
Tuesday, 24 June 2014
Experience:
सूरज ढला तो
कद से ऊँचे हो गए साये,
कभी पैरों से रौंदी थी, यहीं परछाइयां हमने..
तजुर्बे ने एक बात सिखाई है;
एक नया दर्द ही पुराने दर्द की दवाई है!
भग़वान कहते है तलाश ना कर मुझे ज़मीन-ओ-आसमान की गर्दिशों में...
अगर तेरे दिल में नहीं हूँ.. तो कहीं नहीं हूँ मैं
कभी पैरों से रौंदी थी, यहीं परछाइयां हमने..
तजुर्बे ने एक बात सिखाई है;
एक नया दर्द ही पुराने दर्द की दवाई है!
भग़वान कहते है तलाश ना कर मुझे ज़मीन-ओ-आसमान की गर्दिशों में...
अगर तेरे दिल में नहीं हूँ.. तो कहीं नहीं हूँ मैं
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